यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग 6) ठाकुर दलीप सिंघ जी
यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, लोग "ओ माय गॉड" OMG ना कहते। अपितू, पूरे विश्व के लोग "हे प्रभु" कहते।
एक आश्चर्यजनक विडंबना: भारतीय संस्कृति की रक्षक "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" जैसी संस्था ने भी, अपनी वेशभूषा में "निक्कर एवं कानों वाली शर्ट" को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया हुआ है। जिस का भाव यह है कि उन्होंने यूरोपीय शैली की एक वेशभूषा को अपने जीवन में स्थान दे दिया है। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य इंग्लैंड की तरह स्थापित किया होता तो: आज यह संघ वाले विदेशी वेशभूषा न पहनते, बल्कि अपनी भारतीय वेशभूषा पहनते। विदेश की भी बड़ी-बड़ी संस्थाएं भारतीय वेशभूषा पहनती तथा भारतीय वेशभूषा पहन कर उसी पर गर्व करती। यह अंतर होता है: साम्राज्य स्थापित कर के, किसी को (कॉलोनी) उपनिवेश बनाने वालों की सभ्यता का! और, उपनिवेश गुलाम (कॉलोनी) बनने वाली जनता की मानसिकता, सभ्यता, भाषा एवं धर्म का। जनता भले ही कितनी नैतिक, धार्मिक हो; उस जनता की सभ्यता, भाषा, धर्म आदि सभी, उपनिवेश बनाने वाले आक्रांताओं के आगे बड़ी शीघ्रता से पिघल जाते हैं। जैसे, गर्म पानी में बर्फ की टुकड़ी पिघल जाती हैं। उपनिवेश बने गुलाम लोगों की ना कोई सभ्यता बचती है, ना भाषा, ना धर्म। उन गुलामों की तो केवल जनता बचती है, जो अक्रांताओं का अत्याचार सहने के लिए विवशता में जीवित रहती है।
दूसरे देशों को अपना उपनिवेश (कालोनी) न बनाने वाले: धार्मिक, नैतिक भारत को अस्त्रों शस्त्रों के लिए, आर्थिक विकास के लिए और अनेक प्रकार की सहायता के लिए इंग्लैंड एवं अमरीका से भीख मांगनी पड़ती है। इस के विपरीत, पूरे विश्व को अपने अत्याचारों से पीड़ित करने वाले, विश्व को अपना उपनिवेश (कालोनी) बनाने वाले, (कई देशों पर बंब बरसाने वाले, 50 से अधिक देशों की बढ़िया चल रही सुचारू सरकारों को गिराने वाले) इंग्लैंड एवं अमरीका को: भारत के आगे हाथ फैला कर भीख नहीं माँगनी पड़ती। यह अंतर है: क्रूरता व अनैतिकता से साम्राज्य स्थापित करने वाले अमरीका, इंग्लैंड का: तथा, नैतिकता और धार्मिकता रख कर किसी देश को गुलाम न बनाने वाले भारत का।
जीवन की कटु, परंतू अटल सच्चाई यह है कि सदैव ही एक शक्तिशाली धनवान की नकल; धनहीन, शक्तिहीन व्यक्ति करता है। शक्तिशाली धनवान व्यक्ति: पाप कर के ही धनवान व शक्तिशाली बनता है। कोई भी व्यक्ति, कभी भी (केवल) धर्म कार्यों से, नैतिक कार्यों से: धनवान, शक्तिशाली नहीं बन सकता। धनवान बनने हेतु उसे पाप तो करने ही पड़ते हैं। इसी लिए सतगुरु नानक देव जी ने लिखा है "पापा बाझहु होवै नाही" (पन्ना 417)। अर्थ: पाप किए बिना: धन एवं शक्ति प्राप्त नहीं होती। इस का सब से बढ़िया प्रत्यक्ष उदाहरण है कि मानव जाति बाकी सभी जाति प्रजातियों को मार कर, उन पर अत्याचार कर के ही, आज पूरी पृथ्वी पर शासन कर रही है। मानव जाति ने पूरी पृथ्वी को अपना उपनिवेश बनाया हुआ है।
पुलाड़ में या पाताल में: किसी समुन्द्र में, या किसी जंगल में: जो भी कोई नई खोज होती है, उस में जो कोई नई जातियां प्रजातियां मिलती हैं, उनके नाम अंग्रेज़ी में रखे जाते हैं, या किसी यूरोपीय भाषा में रखे जाते हैं। यदि भारत ने विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया होता तो यह सभी नाम: भारतीय भाषा में रखे जाते।
सभी जातियों प्रजातियों के जीव, जंतुओं के, या वनस्पति के जो भी नाम रखे जाते हैं: उन में जो विज्ञानक नाम होते हैं; वह लातिनी भाषा में रखे जाते हैं। परंतु, जो प्रचलित नाम लोगों के लिए होता है, वह अंग्रेज़ी में होता है। अंग्रेज़ी वाला नाम विश्व प्रसिद्ध हो जाता है, जिस को सभी देशों के लोग अचेत में ही उपयोग करने लगते हैं। वैज्ञानिक नाम लातिनी में इस कारण रखा जाता है, क्योंकि लातिनी भाषा अंग्रेज़ी की मूल भाषा है एवं योरूप की सभी भाषाओं का मूल है। जैसे कि भारत की भाषाओं का मूल संस्कृत है। इसी कारण लैटिन भाषा में विज्ञानक नाम (साइंटिफिक नाम) रखे जाते हैं। यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता, तो इन सभी जीव जंतुओं एवं वनस्पति के वैज्ञानिक नामों का नाम-संस्करण, भारतीय भाषा में होता।
विश्व के सभी सागरों के नाम; अचेत में ही पूरा विश्व अंग्रेज़ी में ही ले रहा है। सभी नक्शों पर भी अंग्रेज़ी में रखे नाम ही लिखे जाते हैं। जैसे: इंडियन ओशन, अटलांटिक ओशन, रेड सी: आदि। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो विश्व के सागरों के नाम अंग्रेज़ी में ना होते। पूरा विश्व, भारतीय भाषाओं में ही सागरों के नाम रखता एवं लेता, जैसे कि आज वह अंग्रेज़ी में रख रहा है। स्वतंत्र देशों की जनता को यह पता ही नहीं चलता कि हम तो स्वतंत्र देश हैं, हमारी अपनी भाषा भी समृद्ध है; फिर भी हम अंग्रेज़ी में ही क्यों इन सागरों के नाम ले रहे हैं ? यहां तक कि हम भारतीय अपने देश के सागर का नाम भी अंग्रेज़ी में "इंडियन ओशन" ही लेते हैं। हम अपने सागर को "भारतीय सागर" नहीं कहते।
गरीब में आत्मसम्मान (स्वाभिमान) नहीं होता, उस की कोई इज्जत नहीं होती। क्योंकि, उस को शक्तिशाली, धनवान के सामने झुकना ही पड़ता है। इस लिए शक्तिशाली, धनवान बनिए। अपने भारत को भी शक्तिशाली, धनवान बनाएं।
आज विश्व के सभी लोग समय का आकलन, इंग्लैंड वालों के अनुसार घंटे, मिनट, सेकंड में कर रहे हैं। यदि भारत ने विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया होता; तो सभी लोग भारतीय पद्धति के अनुसार समय का आकलन करते। जैसा के गुरुवाणी में लिखा हुआ है: पल, विसुए, चसिआ, घड़ीआ, पहिरा, थिती आदि “विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ” (सतिगुरू नानक देव जी)।
गूगल पर कोई खोज करने हेतु यदि किसी शब्द को इंग्लिश में टाइप कर के खोज करें; तो वह खोज अत्यंत विस्तृत जानकारी भरपूर होती है। गूगल पर ही उसी शब्द को किसी भारतीय भाषा में लिख कर खोज करें तो; वह खोज उतनी विस्तृत जानकारी भरपूर नहीं होती। क्योंकि, खोज इंग्लिश में नहीं की गई थी। इंग्लैंड का विश्व पर साम्राज्य स्थापित होने कारण, गूगल आदि सभी खोज संग्रहों में, इंग्लिश का ही साम्राज्य बना हुआ है। गूगल पर when I searched "where is India". 6,030,000,000 results (0.22s), अंग्रेज़ी में खोज करने से 6 अरब 3 करोड़ उत्तर मिले। जब मैंने हिंदी में खोज किया "भारत कहां पर है"। हिंदी में खोज करने से केवल 94,400,000 results (0.29s) 9 करोड़ 44 लाख उत्तर मिले। इस टैस्ट से पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है कि गूगल भी इंग्लिश में खोज करने को प्राथमिकता देती है। एवं इंग्लिश में भारत संबंधी सामग्री भी हिंदी के मुकाबले में कहीं अधिक मात्रा में उपलब्ध है। गूगल के इस पक्षपाती व्यवहार के पीछे एक ही कारण है, जो मैं इस पूरे लेख में बता रहा हूं कि इंग्लैंड के विश्व पर साम्राज्य स्थापित करने कारण, इंग्लिश भी विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर के; अपना शासन चला रही है।
भारतीय संस्कृति दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में प्रचलित एवं स्थापित है जैसे: चीन, जापान, थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि। परंतु वहाँ पर भी भारतीय संस्कृति कुछ अंश-मात्र ही है; भारतीय भाषा वहां पर भी उपयोग नहीं होती, परंतु इंग्लिश उपयोग होती है।
इस कारण, यदि भारत ने अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा की सुरक्षा करनी है और इन को प्रफुल्लित कर के स्थापित करना है; तो विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है, भले ही हमें कोई कितना भी बुरा कहता रहे। नैतिक वृति वाले लोग, इंग्लैंड को चाहे कितना भी बुरा कहते रहें, इंग्लिश को कितनी गालियां निकालें; परंतु उन को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवहार एवं वार्तालाप तो इंग्लिश में ही करने पड़ेंगे तथा विनय पत्र (एप्लीकेशन) एवं पत्राचार भी इंग्लिश में ही लिखने पड़ेंगे।
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, भारत को अपनी संस्कृति, भाषा व धर्म की रक्षा हेतु: एवं, इन सभी को प्रफुल्लित कर के विश्व में स्थापित करने हेतु: विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहिए, भले ही उस के लिए कुछ पाप, अनैतिक कर्म भी करने पड़ें।
जय भारत।
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